*SIR: 99% सुनवाई पूरी लेकिन Form-7 के ऑटो- जेनरेशन और आंकड़ों की गुत्थी बरकरार*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*SIR: 99% सुनवाई पूरी लेकिन Form-7 के ऑटो- जेनरेशन और आंकड़ों की गुत्थी बरकरार*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई 




           *Press wire | Election | 18 Oct*


मुंबई । कर्नाटक में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत जारी नोटिसों पर 99% से अधिक सुनवाई पूरी हो चुकी है। चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (CEO) के कार्यालय ने शुक्रवार को बताया कि राज्य में अब सिर्फ 19,365 सुनवाई पेंडिंग हैं। सबसे अधिक 8,224 सुनवाई कलबुर्गी में बाकी हैं। जबकि बेंगलुरु रूरल में 1,523 और गडग में सबसे कम 10 सुनवाई लंबित हैं।
CEO कार्यालय के मुताबिक हर Form-8 रेजिडेंट शिफ्ट के लिए Form-7 अपने आप जेनरेट हो गया है। Form-7 का इस्तेमाल आम तौर पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने या नाम शामिल करने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताने के लिए होता है। ऐसी आपत्ति के बाद नोटिस जारी करने और सुनवाई करने की प्रक्रिया शुरू होती है। यही कारण है कि SIR में सुनवाई के आंकड़ों को Form-7 से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रेस रिलीज़ के अनुसार 16 जून को इलेक्टोरल रोल फ्रीज़ किए जाने और 15 अक्टूबर के बीच कुल 12,79,525 Form-8 एप्लीकेशन मिले। इसी अवधि में 1,55,109 Form-7 एप्लीकेशन फाइल किए गए। 23 सितंबर को क्लेम और ऑब्जेक्शन का समय खत्म होने के बाद Form-7 एप्लीकेशन की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। 24 सितंबर तक यह संख्या 61,130 थी। उसके बाद 15 अक्टूबर तक 93,979 और एप्लीकेशन रिकॉर्ड किए गए। यानि 61,130+93,979 = 1,55,109 Form-7 एप्लीकेशन जो कुल आंकड़े से मेल खाते हैं। क्या स्पष्ट है?वह जाने तो SIR के तहत 99% से अधिक सुनवाई पूरी होने का दावा CEO कार्यालय ने किया है। राज्य में 19,365 सुनवाई अभी पेंडिंग हैं। कलबुर्गी में सबसे अधिक 8,224 सुनवाई लंबित हैं।बेंगलुरु रूरल में 1,523 और गडग में 10 सुनवाई पेंडिंग हैं।16 जून से 15 अक्टूबर के बीच 12,79,525 Form-8 और 1,55,109 Form-7 एप्लीकेशन मिले। हर Form-8 रेजिडेंट शिफ्ट के लिए Form-7 ऑटोमैटिक जेनरेट होने की बात कही गई है। क्या स्पष्ट नहीं है? वह देखें तो प्रेस रिलीज़ में यह साफ नहीं किया गया है कि SIR से पहले भी रहने की जगह बदलने की एप्लीकेशन के लिए Form-7 ऑटोमैटिक जेनरेट होता था या नहीं? यह भी नहीं बताया गया है कि ऑटोमैटिक रूप से जेनरेट हुए कितने Form-7 को कुल Form-7 आंकड़ों में अलग से गिना जाएगा। दूसरे शब्दों में 1,55,109 Form-7 में से कितने लोगों की ओर से दर्ज वास्तविक आपत्तियां हैं और कितने सिर्फ Form-8 के कारण सिस्टम से अपने आप बने हैं। इसका स्पष्ट ब्रेक-अप नहीं दिया गया। Form-8 का इस्तेमाल जब एक असेंबली सीट से दूसरी सीट में रहने की जगह बदलने के लिए किया जाता है तो वोटर का पिछला पता डिलीट हो जाता है। ऐसे में यह साफ नहीं है कि इस प्रक्रिया के लिए एक अलग Form-7 ऑटोमैटिक रूप से क्यों जेनरेट होता है। प्रेस रिलीज़ में रहने की जगह बदलने के लिए मिले Form-8 एप्लीकेशन का ब्रेक-अप भी नहीं दिया गया है। जैसे कितने आवेदन एक ही विधानसभा क्षेत्र के भीतर पता बदलने के थे और कितने एक सीट से दूसरी सीट में शिफ्ट के। क्यों मायने रखता है यह आंकड़ा? वह देखें तो Form-7 आम तौर पर नाम हटाने या आपत्ति उठाने से जुड़ा फॉर्म माना जाता है अगर हर Form-8 पर Form-7 अपने आप बनता है तो Form-7 की कुल संख्या को सीधे तौर पर"जनता की आपत्तियों"के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। 23 सितंबर के बाद Form-7 में आई तेज वृद्धि के पीछे ऑटो-जेनरेशन,वास्तविक आपत्तियां या दोनों का मिश्रण हो सकता है। प्रेस रिलीज़ इस अंतर को स्पष्ट नहीं करती। वहीं सुनवाई पूरी होने का 99% आंकड़ा प्रशासनिक प्रगति दिखाता है लेकिन कुल सुनवाइयों की संख्या जारी न होने से इस दावे की स्वतंत्र गणना नहीं की जा सकती। 19,365 पेंडिंग सुनवाई का आंकड़ा जरूर राज्यवार और जिलेवार स्थिति समझने में मदद करता है। CEO कार्यालय का यह बयान SIR प्रक्रिया में सुनवाई के स्तर पर तेज प्रगति दिखाता है लेकिन Form-7 के ऑटो-जेनरेशन और उसके आंकड़ों के ब्रेक-अप को लेकर पारदर्शिता की कमी बनी हुई है अगर 1,55,109 Form-7 में ऑटो-जेनरेटेड और मैन्युअल आपत्तियों का अलग-अलग हिसाब दिया जाए तो SIR की सुनवाई और आपत्ति प्रक्रिया की सही तस्वीर सामने आ सकेगी फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों से इतना ही कहा जा सकता है कि सुनवाई लगभग पूरी हो चुकी है पर Form-7 के आंकड़ों की व्याख्या अभी अधूरी है। SIR के मुद्दे पर आपके द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर मैंने कुछ अतिरिक्त जानकारियों और विश्लेषणों को जोड़कर एक विस्तृत समाचार रिपोर्ट तैयार की है। यह रिपोर्ट Form-7 के ऑटो-जेनरेशन से जुड़े तकनीकी और कानूनी पहलुओं,राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और इसके व्यापक प्रभावों को उजागर करती है। कर्नाटक में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत जारी नोटिसों पर 99% से अधिक सुनवाई पूरी हो चुकी है। चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (CEO) के कार्यालय ने शुक्रवार को बताया कि राज्य में अब सिर्फ 19,365 सुनवाई पेंडिंग हैं। सबसे अधिक 8,224 सुनवाई कलबुर्गी में बाकी हैं। जबकि बेंगलुरु रूरल में 1,523 और गडग में सबसे कम 10 सुनवाई लंबित हैं। CEO कार्यालय के मुताबिक हर Form-8 रेजिडेंट शिफ्ट के लिए Form-7 अपने आप जेनरेट हो गया है। Form-7 का इस्तेमाल आम तौर पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने या नाम शामिल करने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताने के लिए होता है। ऐसी आपत्ति के बाद नोटिस जारी करने और सुनवाई करने की प्रक्रिया शुरू होती है। यही कारण है कि SIR में सुनवाई के आंकड़ों को Form-7 से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रेस रिलीज़ के अनुसार 16 जून को इलेक्टोरल रोल फ्रीज़ किए जाने और 15 अक्टूबर के बीच कुल 12,79,525 Form-8 एप्लीकेशन मिले। इसी अवधि में 1,55,109 Form-7 एप्लीकेशन फाइल किए गए। 23 सितंबर को क्लेम और ऑब्जेक्शन का समय खत्म होने के बाद Form-7 एप्लीकेशन की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। 24 सितंबर तक यह संख्या 61,130 थी। उसके बाद 15 अक्टूबर तक 93,979 और एप्लीकेशन रिकॉर्ड किए गए। Form-7 का ऑटो-जेनरेशन के मद्देनजर तकनीकी और कानूनी पेच जाने तो CEO कार्यालय का यह बयान कि"हर Form-8 रेजिडेंट शिफ्ट के लिए Form-7 अपने आप जेनरेट हो गया,"SIR प्रक्रिया की सबसे बड़ी तकनीकी और कानूनी गुत्थी को उजागर करता है। चुनाव आयोग (ECI) के ERONET सॉफ्टवेयर द्वारा Form-7 के इस स्वतःजनरेशन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं‌। अधिकारियों की भूमिका पर सवाल पर कानून के अनुसार Form-7 एक आम मतदाता द्वारा दूसरे मतदाता के नाम पर आपत्ति जताने के लिए होता है लेकिन ऑटो-जेनरेशन की स्थिति में,इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) ही ''आपत्तिकर्ता''objector बन जाता है। इससे"आरोप लगाने वाला और फैसला करने वाला"एक ही व्यक्ति हो जाता है। जो निष्पक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है। लिखित प्रोटोकॉल का अभाव देखें तो ईसीआई ने ऑटो- जेनरेटेड Form-7 के लिए कोई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी नहीं की है। चुनाव आयोग के मैनुअल में केवल फोटो सिमिलर एंट्रीज (PSE) सत्यापन के दौरान फॉर्म के ऑटो-जेनरेशन का उल्लेख है लेकिन रेजिडेंट शिफ्ट के लिए नहीं। प्रक्रिया का उल्लंघन देखें तो नियमों के अनुसार किसी भी नाम को हटाने से पहले संबंधित Form-7 को Form 10 में प्रदर्शित करके कम से कम सात दिनों का नोटिस देना अनिवार्य है। ऑटो-जेनरेशन की स्थिति में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे प्रभावित मतदाताओं को सुनवाई का उचित अवसर नहीं मिल पाता। राजनीतिक घमासान और कानूनी लड़ाई के मद्देनजर Form-7 के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने कर्नाटक में एक तीव्र राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है। विपक्ष का आरोप के मद्देनजर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि बीजेपी से जुड़े बूथ लेवल एजेंट्स (BLAs) ने बड़ी संख्या में Form-7 दायर करके मुस्लिम मतदाताओं को व्यवस्थित रूप से मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश की है। दौरान बीजेपी का पलटवार जाने तो बीजेपी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वह SIR प्रक्रिया का समर्थन करती है लेकिन चुनाव आयोग का बचाव नहीं कर रही है। पार्टी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार राजनीतिक बदले की भावना से बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करा रही है। एफआईआर और मुकदमे के मद्देनजर कर्नाटक में बेलगावी,बीदर और मैसूरु जैसे जिलों में Form-7 के कथित दुरुपयोग को लेकर पांच एफआईआर दर्ज की गई हैं। इनमें धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप शामिल हैं। बड़े पैमाने पर नाम हटने का खतरा और सामाजिक प्रभाव के मद्देनजर SIR प्रक्रिया में अब तक 1.08 करोड़ से अधिक मतदाताओं को ASDDO जैसे अनुपस्थित,स्थानांतरित,मृत,डुप्लिकेट व अन्य श्रेणी में चिह्नित किया गया है। कलबुर्गी जैसे जिलों में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। जहां चित्तापुर विधानसभा क्षेत्र में 22.13% मतदाता ASDDO सूची में हैं। जबकि वहां 99.73% मैपिंग दर दर्ज की गई थी। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चिंता जताई है कि इस प्रक्रिया ने सबूत का भार मतदाताओं पर डाल दिया है। जिससे लाखों लोगों के गलत तरीके से बहिष्कृत होने का खतरा है। पारदर्शिता कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज के अनुसार यह प्रक्रिया हाशिए पर रहने वाले मतदाताओं पर अनुपातहीन रूप से बोझ डालती है। जिनके लिए दस्तावेज जुटाना मुश्किल होता है अन्य राज्यों से तुलना के मद्देनजर कर्नाटक की स्थिति की तुलना अन्य राज्यों से करने पर पता चलता है कि SIR का प्रभाव अलग-अलग रहा है। उत्तराखंड में मतदाता सूची में 13.4% की गिरावट दर्ज की गई। जो सबसे अधिक है। वहीं केरल में यह गिरावट सबसे कम 3.22% रही। कुछ रिपोर्टों के अनुसार कर्नाटक में अभी तक किसी भी मतदाता को अंतिम रूप से हटाया नहीं गया है। जिससे यह स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में थोड़ी बेहतर है। CEO कार्यालय का यह बयान SIR प्रक्रिया में सुनवाई के स्तर पर तेज प्रगति दिखाता है लेकिन Form-7 के ऑटो-जेनरेशन और उसके आंकड़ों के ब्रेक-अप को लेकर पारदर्शिता की कमी बनी हुई है। ऑटो-जेनरेटेड Form-7 की संख्या का स्पष्ट ब्यौरा न होने से यह समझना मुश्किल है कि 1,55,109 Form-7 में से कितने वास्तविक मतदाता आपत्तियां हैं और कितने सिर्फ सिस्टम द्वारा बनाए गए हैं। यह तकनीकी और कानूनी गुत्थी न केवल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर चिंता पैदा करती है।

~By √•Press Wire MCP•Digital World• 

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