*ECI का बड़ा खुलासा: सीसीटीवी फुटेज सीमित करने का हवाला देकर आरटीआई में 'शून्य रिकॉर्ड'! बताया*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*ECI का बड़ा खुलासा: सीसीटीवी फुटेज सीमित करने का हवाला देकर आरटीआई में 'शून्य रिकॉर्ड'! बताया*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*Press wire | ECI | 15 Oct*
मुंबई | चुनाव आयोग (ECI) द्वारा दिसंबर 2024 में मतदान केंद्रों के सीसीटीवी फुटेज तक आम जनता की पहुंच को प्रतिबंधित करने के फैसले ने एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। आयोग ने यह कदम"बड़े पैमाने पर आ रही मांगों"का हवाला देकर उठाया था लेकिन एक ताजा आरटीआई (सूचना का अधिकार) जवाब में आयोग ने खुद स्वीकार किया है कि उसके पास ऐसी मांगों का कोई डेटा ही मौजूद नहीं है। घटनाक्रम की समयरेखा देखें तो विवाद की शुरुआत 9-10 दिसंबर 2024 को हुई। जब पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा विधानसभा चुनावों से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और अन्य दस्तावेज जारी करने का आदेश चुनाव आयोग को दिया। इसके ठीक एक सप्ताह बाद 17 दिसंबर 2024 को चुनाव आयोग ने विधि मंत्रालय को पत्र लिखकर नियम 93(2)(क) में संशोधन का प्रस्ताव भेजा। आश्चर्यजनक रूप से मात्र तीन दिनों के भीतर 20 दिसंबर 2024 को प्रस्ताव, मसौदा,अनुमोदन,हिंदी अनुवाद और राजपत्र अधिसूचन सब कुछ पूरा कर लिया गया। संशोधन में क्या बदला? वह जाने तो संशोधन से पहले नियम 93(2)(क) के तहत"चुनाव से संबंधित अन्य सभी कागजात जनता के निरीक्षण के लिए खुले"थे। संशोधन के बाद इसे बदलकर "इन नियमों में निर्दिष्ट अन्य सभी कागजात" कर दिया गया। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब केवल वही दस्तावेज जनता के लिए उपलब्ध होंगे जिनका स्पष्ट उल्लेख नियमों में है चूंकि सीसीटीवी फुटेज का नियमों में कोई जिक्र नहीं है इसलिए यह प्रावधान प्रभावी रूप से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तक जनता की पहुंच को समाप्त कर देता है। आरटीआई के खुलासे के मद्देनजर देखें तो पारदर्शिता कार्यकर्ता कन्हैया कुमार द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन में पूछा गया था कि पिछले पांच वर्षों में सीसीटीवी फुटेज के लिए कुल कितने अनुरोध प्राप्त हुए?14 सितंबर 2026 को दिए गए जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि उसके पास"किसी भी भौतिक रूप में"ऐसा कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। यह जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिसंबर 2024 में नियम बदलते समय आयोग ने खुद दलील दी थी कि सीसीटीवी फुटेज के लिए अनुरोध"लगातार बढ़ रहे थे"और इन्हें उपलब्ध कराने में"भारी प्रशासनिक संसाधनों"की आवश्यकता होती थी। अब आरटीआई जवाब ने आयोग की इसी दलील को संदिग्ध बना दिया है। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने नियम संशोधन का बचाव करते हुए कहा था कि यह"मतदाता की गोपनीयता"की रक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के जरिए फुटेज के दुरुपयोग को रोकने के लिए जरूरी था। आयोग ने यह भी तर्क दिया कि जम्मू-कश्मीर और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में फुटेज साझा करने से मतदाताओं की जान को खतरा हो सकता है हालांकि आरटीआई कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने इस कदम को "पारदर्शिता पर बड़ा हमला"बताया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह संशोधन उच्च न्यायालय के आदेश को विफल करने के लिए"जल्दबाजी"में किया गया। इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चुनाव आयोग ने मई 2025 में दिशानिर्देश जारी करके मतदान केंद्रों के सीसीटीवी और वेबकास्टिंग फुटेज को केवल 45 दिनों तक रखने का प्रावधान कर दिया। जबकि पहले यह अवधि एक वर्ष थी। इसका मतलब है कि अधिकांश फुटेज अब नियमित रूप से नष्ट हो जाती है। जिससे चुनावी अनियमितताओं की स्थिति में सबूत ही नहीं बचता। यह मामला चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर जहां आयोग"बड़े पैमाने पर मांगों"का हवाला देकर नियम बदलता है। वहीं दूसरी ओर वही आयोग यह स्वीकार करता है कि उसके पास इन मांगों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। यह विरोधाभास न केवल आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है बल्कि भारत के चुनावी तंत्र में विश्वास को भी कमजोर करता है। ECI के विरोधाभास के मद्देनजर सबूत नष्ट करने की समयरेखा और ऐतिहासिक उदाहरण। आयोग की अपनी ही दलील का खंडन किया कि"बड़े पैमाने" का कोई आधार नहीं। दिसंबर 2024 में नियम बदलते समय चुनाव आयोग ने दो मुख्य तर्क दिए थे। पहला सीसीटीवी फुटेज के अनुरोध "लगातार बढ़ रहे थे"। दूसरा इन्हें उपलब्ध कराने में"भारी प्रशासनिक संसाधनों और जनशक्ति"की आवश्यकता होती थी लेकिन 14 सितंबर 2026 के आरटीआई जवाब ने इस दलील को खोखला कर दिया। आयोग ने स्पष्ट कहा कि उसके पास ऐसे अनुरोधों की संख्या का"किसी भी भौतिक रूप में"कोई डेटा नहीं है। यह विरोधाभास इसलिए और गंभीर है क्योंकि आयोग की अपनी पुरानी निर्देशिका (2009) में स्पष्ट प्रावधान था कि उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों और अन्य इच्छुक पक्षों से वीडियो रिकॉर्डिंग के निरीक्षण या प्रतियां प्राप्त करने के अनुरोध आते रहे हैं और इनके संरक्षण,सूचीकरण तथा आपूर्ति की प्रक्रिया भी निर्धारित थी यानि आयोग न तो पहले कभी व्यवस्थित रूप से डेटा रखता था और न ही साल 2024 में नियम बदलते समय किसी अध्ययन या रिकॉर्ड का हवाला दे सका। 45 दिनों की सीमा के अंदर सबूत ही खत्म। 30 मई 2025 को आयोग ने एक और बड़ा फैसला लिया। सीसीटीवी फुटेज,वेबकास्टिंग और चुनाव प्रक्रिया की तस्वीरों को केवल 45 दिनों तक रखने का आदेश जारी किया। जबकि पहले यह अवधि एक वर्ष थी। आयोग ने इसे "फुटेज के दुरुपयोग" और"गलत सूचना फैलाने"का हवाला देकर justified ठहराया। इसका नतीजा यह हुआ कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव की दिल्ली के मतदान केंद्रों की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग नष्ट कर दी गई और आयोग ने दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित किया कि यह फुटेज अब जिला निर्वाचन अधिकारियों के पास उपलब्ध नहीं है। यह तब हुआ जब वकील महमूद प्राचा की याचिका पहले से अदालत में लंबित थी और उन्होंने तर्क दिया कि आयोग ने नई निर्देशिका केवल उनकी याचिका को विफल करने के लिए जारी की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश बेअसर के मद्देनजर देखें तो 31 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि मतदान केंद्रों की संख्या 1,200 से बढ़ाकर 1,500 करने के खिलाफ लंबित याचिकाओं के निपटारे तक मतदान की वीडियो क्लिप सुरक्षित रखी जाएं लेकिन आयोग की 30 मई 2025 की 45-दिन की निर्देशिका इस न्यायालयीन आदेश की अवहेलना करती प्रतीत होती है क्योंकि इसके तहत अधिकांश फुटेज स्वत:नष्ट हो जाती है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव के सबूत के मद्देनजर सीसीटीवी क्यों जरूरी है?यह बहस कोई सैद्धांतिक नहीं है। जनवरी 2024 में चंडीगढ़ मेयर चुनाव में रिटर्निंग ऑफिसर अनिल मसीह को सीसीटीवी फुटेज में मतपत्रों से छेड़छाड़ करते हुए कैद किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी फुटेज के आधार पर चुनाव परिणाम रद्द करते हुए AAP-कांग्रेस उम्मीदवार कुलदीप कुमार को विजेता घोषित किया। इस उदाहरण से साबित होता है कि सीसीटीवी फुटेज चुनावी धोखाधड़ी को उजागर करने में निर्णायक सबूत हो सकती है अगर उस समय 45-दिन की निर्देशिका लागू होती तो यह सबूत ही नष्ट हो चुका होता और चोरी पकड़ में न आती। विपक्ष और कानूनी चुनौतियां के मद्देनजर देखें तो कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने संशोधन को"चुनावी प्रक्रिया की तेजी से क्षरण"बताते हुए कहा था कि इस कदम को अदालत में चुनौती दी जाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे"चुनाव आयोग की संस्थागत अखंडता को नष्ट करने की साजिश"करार दिया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दिसंबर 2025 में संसद में सवाल उठाया कि सीसीटीवी और उसके डेटा से जुड़ा नियम क्यों बदला गया?और आयोग को 45 दिन बाद फुटेज नष्ट करने की अनुमति क्यों दी गई? संवैधानिक संदर्भ के हिसाब से अनुच्छेद 324 और विश्वास का संकट। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में स्थापित करता है। जिसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को राजनीतिक और कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रखना है। सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण में कहा था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा हैं। लेकिन जब आयोग स्वयं पारदर्शिता से बचने के लिए नियम बदलता है और सबूत नष्ट करता है तो यह संवैधानिक आदर्शों से भटकाव को दर्शाता है। एक और विरोधाभास के मद्देनजर जनहित याचिका बनाम फुटेज का नष्ट होना। दिसंबर 2024 में जब विधि मंत्रालय ने संशोधन जारी किया तो उसी अवधि में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 10 दिसंबर को आयोग को हरियाणा चुनाव के सीसीटीवी और दस्तावेज महमूद प्राचा को सौंपने का आदेश दिया था। आयोग ने 17 दिसंबर को विधि मंत्रालय को पत्र लिखा और 20 दिसंबर को राजपत्र अधिसूचना जारी हो गई यानि मात्र 10 दिनों में एक अदालती आदेश को विफल करने के लिए पूरी विधायी प्रक्रिया पूरी कर ली गई। यह समयबद्धता स्वयं में एक संकेत है कि नियम संशोधन की मंशा पारदर्शिता से जुड़े सवालों को दबाना था। न कि प्रशासनिक बोझ कम करना। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि चुनाव आयोग ने "बड़े पैमाने पर अनुरोधों"के नाम पर जो नियम बदल दिया गया। उसका कोई डेटा-आधारित प्रमाण आयोग स्वयं प्रस्तुत नहीं कर सकत साथ ही 45 दिनों की नई सीमा ने चुनावी अनियमितताओं की जांच के लिए उपलब्ध सबूतों को ही समाप्त कर दिया है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि सीसीटीवी फुटेज लोकतांत्रिक जवाबदेही का अनिवार्य साधन है। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है अगर आयोग के पास "बड़े पैमाने" का कोई रिकॉर्ड नहीं तो दिसंबर 2024 में नियम बदलने का आधार क्या था?
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