कोई बॉन्ड साइन नहीं किया फिर उतरेंगे सड़कों पर: बॉन्ड विवाद में उलझा CJP-दिल्ली पुलिस टकराव, आंदोलन जारी रखने का ऐलान*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*कोई बॉन्ड साइन नहीं किया फिर उतरेंगे सड़कों पर: बॉन्ड विवाद में उलझा CJP-दिल्ली पुलिस टकराव, आंदोलन जारी रखने का ऐलान*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*Press Wire| CJP | 12 Oct*
मुंबई । कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने दिल्ली पुलिस के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। जिसमें कहा गया था कि उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त वाले 50,000 रुपए के बॉन्ड पर रिहा किया गया है। रिहाई के कुछ ही घंटों बाद दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि हमने ऐसा कोई बॉन्ड साइन नहीं किया है जो हमें विरोध प्रदर्शन करने से रोके। हम फिर से सड़कों पर उतरेंगे।यह बयान दिल्ली पुलिस के उस आधिकारिक बयान के सीधे विरोध में है। जिसमें कहा गया था कि दिपके,सौरव दास और आशुतोष रांका को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) कोर्ट के समक्ष पेश किए जाने के बाद 50,000 रुपए के श्योरिटी बॉन्ड पर रिहा किया गया और उन्हें एक साल तक शांति व सदाचार बनाए रखने की शर्त रखी गई। दो पक्षों का आमना- सामना जाने तो दिल्ली पुलिस ने रविवार को जानकारी दी कि तीनों CJP नेताओं को BNSS की धारा 126 (शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा) और धारा 170 (संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए गिरफ्तारी) के तहत एहतियाती हिरासत में लिया गया था। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार उन्हें “एक साल तक शांति भंग न करने” की शर्त पर व्यक्तिगत बॉन्ड भरने के बाद रिहा किया गया। उनके वकील सौतिक बनर्जी ने अदालत में तर्क दिया कि पुलिस “आगे की हिरासत के लिए कोई आधार नहीं दे सकी”। जिसके बाद रिहाई का आदेश दिया गया हालांकि दिपके ने इस शर्त को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि वे कोई ऐसा बॉन्ड नहीं भरेंगे। जो उनके विरोध के अधिकार को सीमित करे। नागपुर हवाई अड्डे पर पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि हम फिर सड़कों पर उतरेंगे। हम अमित शाह और मोदी जैसे लोगों से नहीं डरेंगे। हमें एक बार नहीं। सौ बार जेल में डालो। हम तुम्हारी तानाशाही से नहीं डरते। CJP का आंदोलन और मुख्य मांगें देखें तो CJP का यह आंदोलन मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर केंद्रित है। पार्टी के तीन प्रमुख मांगें हैं। ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई साल 2025 की SIR सूची को फ्रीज करना, और नए CEC का चयन एक स्वतंत्र निकाय द्वारा किया जाना। दिपके ने ज्ञानेश कुमार को “देशद्रोही”करार देते हुए कहा था कि जब तक वे इस्तीफा नहीं देते आंदोलन जारी रहेगा। इस विरोध का पृष्ठभूमि विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया है। जिसके तहत देशभर में लगभग 13 करोड़ (130 मिलियन) नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं। आलोचकों का आरोप है कि इस प्रक्रिया ने अल्पसंख्यकों,विशेषकर मुसलमानों को असमान रूप से प्रभावित किया है। CJP ने इस मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। सौरव दास ने कहा कि “विरोध सिर्फ दिल्ली में नहीं। पूरे देश में होगा।”हिरासत के दौरान अधिकारों के उल्लंघन के आरोप को लेकर रिहाई के बाद सौरव दास ने दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि हिरासत के दौरान CJP नेताओं के मोबाइल फोन बिना किसी सीजर मेमो के जब्त कर लिए गए और उन्हें वकीलों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई। दास ने आशंका जताई कि पुलिस ने उनके फोन हैक या क्लोन किए हो सकते हैं ताकि बाद में उनके खिलाफ सबूत के रूप में सामग्री लगाई जा सके। दिपके ने भी आरोप लगाया कि उनकी दादी के निधन की सूचना मिलने के बाद भी उन्हें अपने परिवार से बात करने की अनुमति नहीं दी गई और उन्हें रात 3:30 बजे माता-पिता को फोन करने के लिए कहा गया।“शांति बॉन्ड”और संवैधानिक अधिकार का टकराव के मद्देनजर इस विवाद का कानूनी पहलू महत्वपूर्ण है। BNSS की धारा 126 के तहत एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरने की मांग कर सकता है। यदि उसे लगता है कि वह व्यक्ति “शांति भंग”कर सकता है लेकिन CJP नेताओं के वकील का तर्क है कि“शांति भंग का अर्थ केवल वह गतिविधि है जो संवैधानिक रूप से अनुमत नहीं है और मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित नहीं है।”यानि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना । जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत संरक्षित अधिकार है। उसे “शांति भंग”नहीं माना जा सकता। दिल्ली पुलिस द्वारा लगाई गई शर्त,यदि व्यापक रूप से लागू की जाए तो यह CJP के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा प्रतिबंध है। CJP ने दिल्ली पुलिस को 24 घंटे की समय-सीमा दी है कि वह जंतर मंतर पर प्रदर्शन की तारीख तय करे। इस बीच दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और कुछ मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश-निकास बंद कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई में निर्देश दिया कि शांतिपूर्वक एकत्र होने वाले लोगों को अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए और दिल्ली मेट्रो की सामान्य सेवा सुनिश्चित की जानी चाहिए। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भी दिल्ली में “मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए” सभी लोगों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की मांग की है। यह टकराव केवल एक बॉन्ड विवाद नहीं है । यह भारत में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार,मतदाता सूची पुनरीक्षण की पारदर्शिता और युवा-नेतृत्व वाले जनआंदोलन के राजनीतिक प्रभाव के बीच बहस का प्रतीक बन गया है। CJP ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पीछे नहीं हटेगा और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रहेगा।
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