*आरोपों के घेरे में CJI: सूर्यकांत की नियुक्ति, कॉलेजियम की चुप्पी और न्यायपालिका की विश्वसनीयता का संकट*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*आरोपों के घेरे में CJI: सूर्यकांत की नियुक्ति, कॉलेजियम की चुप्पी और न्यायपालिका की विश्वसनीयता का संकट*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


                 *Press wire | CJI |15 Oct*




मुंबई | साल 2012 में रियल एस्टेट एजेंट की शिकायत की थी। साल 2017 में कैदी की रिश्वत की याचिका। कॉलेजियम ने छह साल तक सुनवाई नहीं की फिर भी हिमाचल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति। अब देश के 53वें CJI बने सूर्यकांत पर उठने लगे गंभीर सवाल। इस मामले में मुख्य बिंदु के मद्देनजर साल 2012 में चंडीगढ़ के रियल एस्टेट एजेंट सतीश कुमार जैन ने तत्कालीन CJI एस.एच.कपाड़िया को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति सूर्यकांत पर कम कीमत दिखाकर करोड़ों रुपये की संपत्ति के अवैध कारोबार का आरोप लगाया। साल 2017 में पंजाब के एक कैदी सुरजीत सिंह ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि सूर्यकांत ने 8 मामलों में रिश्वत लेकर जमानत दी। याचिका में बिचौलियों के नाम भी बताए गए। साल 2018: सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश ए.के.गोयल ने इन आरोपों की गंभीर जांच तक सूर्यकांत को मुख्य न्यायाधीश बनाने का विरोध किया लेकिन अक्टूबर 2018 में उन्हें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। साल 2019 में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने भी जांच की मांग की थी फिर भी मई 2019 में सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किए गए। साल 2025 में CJI बनने से पहले कार्यकर्ता राकेश रमन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को शिकायत भेजकर सार्वजनिक जांच की मांग की। 24 नवंबर 2025 को सूर्यकांत ने देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। साल 2012 का आरोप के मद्देनजर करोड़ों की संपत्ति और कम कीमत दिखाने का मामला। अगस्त 2012 में चंडीगढ़ के रियल एस्टेट एजेंट सतीश कुमार जैन ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.एच.कपाड़िया को पत्र लिखा। पत्र में आरोप लगाया गया कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कम कीमत दिखाकर करोड़ों रुपये की संपत्ति का अवैध कारोबार किया। शिकायत के साथ 2010 से 2011 के बीच खरीदी-बेची गई चार संपत्तियों के सेल डीड संलग्न किए गए। रिपोर्टों के अनुसार ये संपत्तियां दिल्ली,पंचकूला और हिमाचल प्रदेश में थीं। आरोप था कि संपत्तियों की बाजार कीमत से कहीं कम कीमत दिखाकर सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया गया और नकद लेन-देन तथा बेनामी होल्डिंग का सहारा लिया गया। कथित तौर पर यह मामला 7.63 करोड़ रुपये से जुड़ा था। हालांकि इन आरोपों की कभी कोई स्वतंत्र न्यायिक जांच नहीं हुई। साल 2017 की याचिका में 8 मामलों में रिश्वत लेकर जमानत देने का आरोप हैं। साल 2017 में पंजाब के एक कैदी सुरजीत सिंह ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 8 मामलों में रिश्वत लेकर जमानत दी। याचिका में बिचौलियों के नाम भी दिए गए। ये मामले मुख्य रूप से NDPS (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट) से जुड़े थे और करीब 2015 से 2017 के बीच के थे। इस याचिका पर भी छह साल तक कॉलेजियम ने कोई सुनवाई नहीं की। इस बीच सूर्यकांत पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में जज बने रहे। कॉलेजियम की चुप्पी और ए.के.गोयल के विरोध के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश ए.के.गोयल ने सूर्यकांत की पदोन्नति का स्पष्ट विरोध किया। चूंकि गोयल भी पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से आते थे इसलिए कॉलेजियम ने उनकी राय मांगी। गोयल ने तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा को लिखे पत्र में कहा कि वे सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने के प्रस्ताव से“सम्मानपूर्वक असहमत” हैं। गोयल ने कहा था कि गंभीर जांच पूरी होने तक सूर्यकांत मुख्य न्यायाधीश पद के योग्य नहीं हैं। उन्होंने संपत्तियों के स्वतंत्र मूल्यांकन की सिफारिश भी की थी लेकिन उन्हें इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। कॉलेजियम ने गोयल की आपत्ति को दरकिनार कर दिया और अक्टूबर 2018 में सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। साल 2019 सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति और प्रशांत भूषण के पत्र के मद्देनजर जनवरी 2019 में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने तत्कालीन CJI रंजन गोगोई को पत्र लिखकर सूर्यकांत के खिलाफ आंतरिक जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि गंभीर आरोपों की विश्वसनीय जांच से पहले सूर्यकांत के नाम पर सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति पर विचार नहीं किया जाना चाहिए लेकिन मई 2019 में सूर्यकांत को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत कर दिया गया। कॉलेजियम ने अपने फैसले में कहा कि सभी हाईकोर्टों को सुप्रीम कोर्ट में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की जरूरत को ध्यान में रखा गया है। साल 2025 CJI बनने से पहले नई शिकायत दर्ज हुई थी। साल 2025 में सूर्यकांत के CJI बनने से ठीक पहले कार्यकर्ता राकेश रमन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को औपचारिक शिकायत भेजी गई। शिकायत में कहा गया कि साल 2012 और 2017 के आरोपों की कभी कोई स्वतंत्र या सार्वजनिक जांच नहीं हुई। कॉलेजियम और कानून मंत्रालय ने इन मामलों पर पूरी चुप्पी साध रखी है। शिकायत में सवाल उठाए गए । वह देखें तो क्या सूर्यकांत के खिलाफ वित्तीय अनियमितता की कोई जांच हुई?साल 2012 और साल 2017 के आरोपों पर उनका क्या जवाब है?इन आरोपों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?जब तक आरोपों की जांच नहीं होती। उन्हें देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर कैसे बैठाया जा सकता है?24 नवंबर 2025 को सूर्यकांत ने भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल फरवरी 2027 तक है। सिर्फ व्यक्ति का मामला नहीं पर सिस्टम का सवाल है। यह मामला सिर्फ न्यायमूर्ति सूर्यकांत तक सीमित नहीं है। यह भारत की न्यायिक नियुक्ति प्रणाली और कॉलेजियम की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल है। कॉलेजियम की पारदर्शिता के मद्देनजर कॉलेजियम बंद दरवाजों में फैसले करता है। जजों के खिलाफ शिकायतों की जांच कैसे हो? इसकी कोई स्पष्ट और सार्वजनिक प्रक्रिया नहीं है। इन-हाउस प्रोसीजर का सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस प्रक्रिया है लेकिन वह गोपनीय होती है अगर शिकायतें सालों तक लंबित रहें और कोई नतीजा सार्वजनिक न हो तो जनता का भरोसा कमजोर होता है। पदोन्नति पर आरोपों का असर देखें तो जब गंभीर आरोपों वाले जज को हाईकोर्ट CJ और फिर सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया जाता है। तो इससे यह संदेश जाता है कि जवाबदेही से बड़ा करियर है। न्यायपालिका की छवि के मद्देनजर न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम रक्षक है अगर सर्वोच्च अदालत के शीर्ष पर ही ऐसे आरोपों की जांच न हो तो आम नागरिक का विश्वास हिल सकता है। यह सच है कि साल 2012 और साल 2017 के आरोप अब तक किसी सक्षम अदालत में सिद्ध नहीं हुए हैं लेकिन यह भी सच है कि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच भी नहीं हुई। छह साल तक कॉलेजियम में शिकायतें लंबित रहीं। विरोध के बावजूद पदोन्नति हुई और अब वही व्यक्ति देश के मुख्य न्यायाधीश हैं। सवाल यह नहीं है कि सूर्यकांत दोषी हैं या निर्दोष। सवाल यह है कि दोषी या निर्दोष साबित करने की प्रक्रिया क्यों नहीं हुई? जब तक न्यायपालिका अपने ही सदस्यों के खिलाफ पारदर्शी और स्वतंत्र जांच की व्यवस्था नहीं करेगी‌। तब तक ऐसे आरोप न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कमजोर करते रहेंगे।यहां यह  ध्यान दे कि विश्लेषण "कारवां पत्रिका"में अतुल देव की रिपोर्ट सार्वजनिक दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। ये आरोप हैं अदालत में सिद्ध नहीं हुए हैं लेकिन इनकी स्वतंत्र जांच न होना एक गंभीर संस्थागत प्रश्न है। दौरान पूरक तथ्य एवं गहन विश्लेषण के मद्देनजर CJI सूर्यकांत मामले में जुड़ी नई जानकारियाँ देखें तो पिछले विश्लेषण में दिए गए तथ्यों के आधार पर यहाँ कुछ अतिरिक्त,सत्यापित और महत्वपूर्ण जानकारियाँ जोड़ी गई हैं। जो इस मामले की गंभीरता और इसके संस्थागत निहितार्थों को और स्पष्ट करती हैं। सीजेआई सूर्यकांत का कार्यकाल और पृष्ठभूमि के मद्देनजर सीजेआई सूर्यकांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार में हुआ। उन्होंने साल 1984 में कानून की डिग्री ली और साल 2000 में हरियाणा के सबसे युवा महाधिवक्ता (Advocate General) बने। साल 2004 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश बने। अक्टूबर 2018 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने, मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत हुए और 24 नवंबर 2025 को देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। उनका कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक है। यह कार्यकाल लगभग 14-15 महीने का है। जो उनके दो पूर्ववर्तियों के छोटे कार्यकाल के बाद स्थिरता प्रदान करता है। साल 2012 की शिकायत के अतिरिक्त विवरण जाने तो सतीश कुमार जैन की शिकायत में यह आरोप था कि सूर्यकांत ने कम कीमत दिखाकर संपत्ति की खरीद-फरोख्त की थी। जिसमें नकद लेनदेन और बेनामी होल्डिंग शामिल थी। यह मामला 7.63 करोड़ रुपये के बकाया और कर चोरी से जुड़ा था। शिकायत में मार्च 2010 से मार्च 2011 के बीच खरीदी-बेची गई चार संपत्तियों के सेल डीड संलग्न थे। एक विशेष उदाहरण में हिमाचल प्रदेश में एक फार्महाउस 13 लाख रुपये में बेचा गया। जबकि उसकी वास्तविक कीमत 2.32 करोड़ रुपये थी। शेष राशि नकद में ली गई।11 सितंबर 2012 को शिकायत भेजने के लगभग तीन सप्ताह बाद जैन को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से जवाब मिला हालांकि इसके बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। साल 2017 की शिकायत के हिसाब से कैदी की याचिका और 8 मामले लंबित हैं। पंजाब के कैदी सुरजीत सिंह ने 2017 में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि सूर्यकांत ने 8 मामलों में रिश्वत लेकर जमानत दी। ये मामले मुख्य रूप से NDPS (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट) से जुड़े थे। याचिका में बिचौलियों के नाम भी दिए गए थे।
यह याचिका भी छह साल से अधिक समय तक कॉलेजियम के पास लंबित रही। न्यायमूर्ति ए.के.गोयल का विरोध और कॉलेजियम की अनदेखी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश ए.के.गोयल ने सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने का स्पष्ट विरोध किया था। उन्होंने तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा को लिखे पत्र में कहा था। गंभीर जांच पूरी होने तक सूर्यकांत मुख्य न्यायाधीश पद के योग्य नहीं हैं। गोयल ने संपत्तियों के स्वतंत्र मूल्यांकन की सिफारिश भी की थी लेकिन उन्हें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। कॉलेजियम ने गोयल की आपत्ति को दरकिनार कर दिया और अक्टूबर 2018 में सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति के मद्देनजर कॉलेजियम का तर्क देखें तो 8 मई 2019 के कॉलेजियम प्रस्ताव में कहा गया कि सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी.आर.गवई की नियुक्ति “योग्यता, आचरण और ईमानदारी”के आधार पर की जा रही है साथ ही सभी उच्च न्यायालयों को सुप्रीम कोर्ट में उचित प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई हालांकि इस प्रस्ताव में साल 2012 और साल 2017 की शिकायतों का कोई उल्लेख नहीं किया गया। कॉलेजियम ने “आचरण और ईमानदारी”का हवाला देते हुए भी इन लंबित आरोपों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। CJI बनने से पहले राकेश रमन की राष्ट्रपति को शिकायत की थी। अक्टूबर 2025 में कार्यकर्ता राकेश रमन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को औपचारिक शिकायत भेजकर सूर्यकांत की CJI नियुक्ति पर रोक लगाने और सार्वजनिक समीक्षा की मांग की। शिकायत में कहा गया। “इन आरोपों की कभी कोई स्वतंत्र या सार्वजनिक जांच नहीं हुई। कॉलेजियम और कानून मंत्रालय ने संभावित आपराधिक और नैतिक कदाचार के आरोपों पर पूरी चुप्पी साध रखी है। शिकायत में यह भी कहा गया कि “अगर ऐसे गंभीर अनसुलझे आरोपों वाले न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायिक पद पर बैठाया जाता है तो सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता और स्वयं विधि का शासन अपूरणीय क्षति उठाएगा। CJI बनने के बाद के घटनाक्रम को जाने तो सूर्यकांत ने CJI बनने के बाद अपने ही कार्यकाल में न्यायिक भ्रष्टाचार पर चौंकाने वाला बयान दिया। दिसंबर 2025 में उन्होंने कहा कि “रिटायरमेंट से पहले छक्के लगाना” न्यायपालिका में एक “दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति” है। यह बयान उस व्यक्ति से आया जिस पर स्वयं भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। अगस्त-सितंबर 2026 में जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संदीप मेहता ने राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत की थी तो CJI सूर्यकांत ने कहा कि“आरोप लगाना अपने आप में किसी न्यायाधीश के खिलाफ निष्कर्ष नहीं माना जा सकता” और मामले को“स्थापित तंत्र”के माध्यम से हल किया जाएगा। यह वही व्यक्ति है जिसके खिलाफ साल 2012 और साल 2017 के आरोप 13 साल से अधिक समय से“स्थापित तंत्र”में लंबित हैं और आज तक उनकी जांच नहीं हुई। न्यायिक कार्यों की दोहरी छवि के मद्देनजर देखें तो सूर्यकांत के न्यायिक रिकॉर्ड में कुछ महत्वपूर्ण फैसले भी हैं। जो उनकी छवि को जटिल बनाते हैं। जेल सुधार के मद्देनजर उन्होंने कैदियों की वैवाहिक मुलाकात और प्रजनन अधिकारों को संवैधानिक गारंटी के रूप में मान्यता दी। डेरा सच्चा सौदा के मद्देनजर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में उन्होंने डेरा सच्चा सौदा की संपत्तियों के लेनदेन की केंद्रीय जांच के आदेश दिए और साल 2017 की हिंसा के बाद संपत्तियों की कुर्की का आदेश दिया। मानवीय पहल के मद्देनजर एक हत्या के मामले में जब उन्हें पता चला कि दोषी की चार बेटियाँ हैं तो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से एक कॉलेज प्रिंसिपल से बात कर दोषी की बड़ी बेटी को मुफ्त शिक्षा दिलवाई। ये फैसले दर्शाते हैं कि सूर्यकांत का न्यायिक रिकॉर्ड संवेदनशीलता और सक्रियता से भरा है लेकिन यह भ्रष्टाचार के आरोपों की गंभीरता को कम नहीं करता। संस्थागत संकट के मद्देनजर इन-हाउस प्रोसीजर की सीमाएँ। सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस प्रक्रिया (In-House Procedure) न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जांच का एकमात्र तंत्र है लेकिन यह प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय है। इसमें कोई समयसीमा नहीं है और इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं होता। CJI सूर्यकांत ने स्वयं कहा है कि “आरोपों को सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं उठाया जाना चाहिए” और“स्थापित तंत्र”के माध्यम से ही निपटाया जाना चाहिए लेकिन जब यही “स्थापित तंत्र” 13 साल तक किसी शिकायत पर कार्रवाई नहीं करता तो “सार्वजनिक न करना”का अर्थ “कभी न करना”हो जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार CJI सूर्यकांत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत FIR दर्ज करने की सिफारिश कर सकते हैं लेकिन यह अधिकार उनके पास है। उनके खिलाफ मामलों के लिए नहीं। अब यहां सवाल व्यक्ति का नहीं है पर व्यवस्था का है। उसके मद्देनजर सूर्यकांत के मामले में निम्नलिखित नए तथ्य जोड़े जाने चाहिए । वह जाने तो सबसे पहले इसके पहलू व तथ्य देख ले कि कार्यकाल 24 नवंबर 2025 को 9 फरवरी 2027 (लगभग 14-15 महीने)। साल 2012 की शिकायत 7.63 करोड़ रुपये,चार संपत्तियाँ,नकद लेनदेन,बेनामी होल्डिंग। साल 2017 की शिकायत 8 मामलों में रिश्वत लेकर जमानत‌। NDPS मामले कॉलेजियम में लंबित। साल2012 से अब तक (13+ वर्ष)। साल 2017 से अब तक (8+ वर्ष)। विरोध न्यायमूर्ति ए.के.गोयल (2018) वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण (2019)। जांच के मद्देनजर आज तक कोई स्वतंत्र जांच नहीं। CJI बनने के बाद भ्रष्टाचार पर बयान लेकिन स्वयं के आरोपों पर मौन। मूल प्रश्न यह है कि क्या कोई व्यक्ति जिसके खिलाफ 13 साल पुराने गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप कभी जांचे नहीं गए। देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर बैठ सकता है?यह प्रश्न सूर्यकांत के दोषी या निर्दोष होने का नहीं है। यह प्रश्न प्रक्रिया और जवाबदेही का है। जब तक न्यायपालिका अपने ही सदस्यों के खिलाफ पारदर्शी, समयबद्ध और स्वतंत्र जांच की व्यवस्था नहीं करेगी, तब तक ऐसे मामले न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कमजोर करते रहेंगे। यहां यह ध्यान दें कि उपरोक्त सभी तथ्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों,शिकायतों और न्यायालय के रिकॉर्ड पर आधारित हैं। ये आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हुए हैं लेकिन इनकी स्वतंत्र जांच न होना और 13 वर्षों तक कॉलेजियम में लंबित रहना एक गंभीर संस्थागत प्रश्न है। जिस पर सार्वजनिक बहस आवश्यक है।

~By √• Press Wire MCP•Digital World•
#CJI #Corruption #SuryaKant #JudicialAccountability

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