*वोट का अधिकार गंभीर खतरे में': जस्टिस रोहिंटन नारिमन का चेतावनी भरा बयान और चुनाव आयोग पर सवालों की पूरी कहानी*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*वोट का अधिकार गंभीर खतरे में': जस्टिस रोहिंटन नारिमन का चेतावनी भरा बयान और चुनाव आयोग पर सवालों की पूरी कहानी*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई 

       


  
     *Press wire| right to vote | 24 Oct*



मुंबई | सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नारिमन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। जिसमें उन्होंने भारत के चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि "वोट देने का अधिकार गंभीर खतरे में है"। यह बयान ऐसे समय आया है । जब पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर विवाद गहरा रहा है और मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। मुख्य मुद्दा जाने तो 90 लाख मतदाताओं का ''गैरकानूनी'' बहिष्कार के मद्देनजर जस्टिस नारिमन ने 4 अक्टूबर 2026 को राजकोट के राजकुमार कॉलेज में''संविधान और आम आदमी'' विषय पर बोलते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। उन्होंने चौंकाने वाला आंकड़ा पेश करते हुए बताया कि इनमें से करीब 22 लाख लोगों ने अपील की, और जिन अपीलों का निपटारा हो चुका है। उनमें से 93 प्रतिशत मामलों में फैसला मतदाताओं के पक्ष में आया। उन्होंने कहा कि क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यह आम आदमी भारत के नागरिक को पूरी तरह से गैर-कानूनी तरीके से बाहर करना था ताकि सरकार जो चाहती है। वो हासिल कर सके। चुनाव आयोग में आंतरिक टकराव और धारा 18 का सवाल जाने तो पूर्व जज ने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के साथ काम कर रहे दोनों चुनाव आयुक्तों ने CEC के फैसलों के खिलाफ 14 बार आपत्ति दर्ज की। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दो आयुक्तों का बहुमत CEC के फैसलों के खिलाफ था, तो उन्होंने चुनाव आयुक्त अधिनियम,2023 की धारा 18 का इस्तेमाल करके बहुमत के आधार पर फैसला लागू करने की मांग क्यों नहीं की। उनके मुताबिक ऐसा न करना संवैधानिक प्रक्रिया के लिहाज से एक गंभीर चूक है। नियुक्ति प्रक्रिया पर''रेड फ्लैग''के बारे में सरकार के हाथ में सारी शक्ति के मद्देनजर देखें तो जस्टिस नारिमन ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था को भी"खतरे की घंटी"बताया। उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने साल 2023 में अनूप बरनवाल मामले में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) वाली समिति का सुझाव दिया था लेकिन सरकार ने कानून बनाकर CJI को इस समिति से बाहर कर दिया और उनकी जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया। उन्होंने कहा कि अगर नियुक्ति ही सरकार के हाथ में हो तो पद से हटाने की कठिन प्रक्रिया का कोई खास मतलब नहीं रह जाता। सुप्रीम कोर्ट से अपील जाने तो पूर्व न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट जो एक संस्था है । जिसका मैं कभी हिस्सा था। तुरंत कदम उठाएगा और इन पर सवाल के मद्देनजर जस्टिस नारिमन का यह बयान सिर्फ एक पूर्व न्यायाधीश की राय नहीं है बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की सबसे संवेदनशील कड़ी पर उठ रहे सवालों का प्रतिनिधित्व करता है। जब चुनाव आयोग के भीतर ही पारदर्शिता और सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगने लगें तो आम नागरिक के लोकतंत्र पर भरोसे का डगमगाना स्वाभाविक है। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या वह चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था के रूप में बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाता है। जस्टिस नारिमन की चेतावनी वास्तविक संस्थागत बीमारी की ओर इशारा करती है लेकिन कारण-निरूपण में “डेटा में असामान्यता”और “जानबूझकर किया गया इरादा” के बीच फर्क करना जरूरी है। अधिक सटीक रूप में कहें तो समस्या किसी एक SIR में नहीं बल्कि इस बात में है कि एक ऐसी चुनाव प्रबंधन संस्था,जिसका आंतरिक संतुलन कमजोर पड़ चुका है, बाहरी जवाबदेही मुश्किल हो गई है और नियुक्ति की स्वतंत्रता संदिग्ध है। उसे लगातार अधिक विवेकाधिकार मिल रहा है। जबकि उस पर नियंत्रण रखने वाले संस्थागत उपकरण साथ-साथ कमजोर होते जा रहे हैं। आरोप के आधार हैं लेकिन “93%” को परतों में समझना होगा। पश्चिम बंगाल में SIR के तहत लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो राज्य के कुल मतदाताओं का करीब 12% है। इनमें से करीब 22.2 लाख लोगों ने अपील की और जिन मामलों का फैसला हो चुका है। उनमें लगभग 93% मामलों में मतदाताओं को बहाल किया गया। यह आंकड़ा वाकई ECI द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे से आया है। इस दृष्टि से “हटाए गए लोगों में से भारी बहुमत,स्वतंत्र निर्णय के बाद योग्य पाए गए” एक ऐसा तथ्य-आधारित निष्कर्ष है। जिसे स्वीकार किया जा सकता है लेकिन ECI का बचाव भी अपना तर्क रखता है। अब तक निपटाए गए मामले बहुत कम हैं (सितंबर 2026 तक करीब 1.26 लाख) और पहले निपटाए गए मामले अक्सर वे होते हैं जिनमें पूरा लिखित सबूत मौजूद होता है इसलिए 93% बहाली को सीधे तौर पर सभी 22.2 लाख अपीलकर्ताओं पर लागू नहीं किया जा सकता और न ही इसे सभी 91 लाख हटाए गए लोगों के लिए “93% योग्य थे” का सबूत माना जा सकता है। असली संस्थागत चोट “93%” के आंकड़े में नहीं बल्कि इस बात में है कि मतदाता- योग्यता छीनने की एक ऐसी प्रक्रिया,जिसे अत्यंत सतर्कता से चलना चाहिए। चुनाव से ठीक पहले इतने बड़े पैमाने और इतनी तेजी से चलाई गई कि बड़ी संख्या में योग्य मतदाताओं को अपना वोट अधिकार बहाल कराने के लिए बाद में अपील का रास्ता लेना पड़ा। यह अपने आप में चुनावी अखंडता पर व्यवस्थागत दबाव पैदा करता है। 14 बार दर्ज आपत्तियों का मुद्दा “मतभेद” नहीं बल्कि “किसे आयोग के नाम पर निर्णय लेने का अधिकार है। दो चुनाव आयुक्तों,संधू और जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं‌। जो फॉर्म 6 में बदलाव,SIR में नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटाबेस पर नियंत्रण जैसे चुनाव प्रबंधन के मूल कार्यों से जुड़ी थीं। मुख्य कानूनी तथ्य यह है। साल 2023 के कानून की धारा 18 स्पष्ट कहती है कि आयोग के काम “जहां तक संभव हो” सर्वसम्मति से हों। सहमति न बनने पर बहुमत के आधार पर निर्णय होगा। तीन सदस्यीय आयोग में इसका अर्थ है कि 2 बनाम 1 का बहुमत कानूनी रूप से CEC को पूरी तरह पीछे छोड़ सकता है इसलिए विवाद का असली सवाल यह नहीं है कि “CEC की अलग राय नहीं हो सकती” बल्कि यह है कि क्या “आयोग” के नाम पर ऐसे निर्णय लिए गए जिन्हें बहुमत वाले सदस्यों की वास्तविक मंजूरी नहीं थी। आपत्तियों में यह बात उठी है कि ECI के नाम से भेजे गए कुछ संदेश आयोग की आवश्यक मंजूरी के बिना भेजे गए। अगर सुप्रीम कोर्ट इसे स्वीकार करता है तो मामला “नीतिगत मतभेद” से बढ़कर प्रक्रियात्मक अधिकार-अतिक्रमण बन जाता है। CEC की “प्रमुख” हैसियत में दो सहयोगियों पर वीटो का अधिकार शामिल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने टी.एन.शेषन के दौर में ही बहु-सदस्यीय आयोग के सामूहिक स्वरूप को स्थापित कर दिया था। संस्थागत स्तर के मद्देनजर नियुक्ति की स्वतंत्रता का कमजोर होना आंतरिक संतुलन की नाजुकता को और बढ़ा देता है। नारिमन द्वारा उठाया गया नियुक्ति प्रक्रिया का मुद्दा भी तथ्यों से समर्थित है। 2023 के कानून ने चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में CJI को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया। जिससे समिति “प्रधानमंत्री + विपक्ष के नेता + प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री” बन गई। सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस मुद्दे पर बंटा हुआ है। दो न्यायाधीशों में इस पर मतभेद है कि इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजा जाए या नहीं। मामला अब बड़ी पीठ के पास है। इस बदलाव का संरचनात्मक परिणाम यह है। जब नियुक्ति की शक्ति व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका में केंद्रित हो जाती है तो आंतरिक असहमति की संस्थागत कीमत काफी बढ़ जाती है। दो आयुक्तों का 14 बार असहमति दर्ज करना यह दिखाता है कि व्यक्तिगत साहस अभी बचा है लेकिन अगर नियुक्ति तंत्र स्वयं “सहयोगी” किस्म के आयुक्तों को चुनने की ओर झुकता है, तो सामूहिक निर्णय प्रणाली को कार्मिक स्तर पर ही पहले से खोखला किया जा सकता है। नारिमन का यह तर्क कि अगर नियुक्ति पर प्रशासन का प्रभुत्व हो तो हटाने की कठिन प्रक्रिया का संतुलनकारी महत्व खो जाता है। इसी गहरे प्रोत्साहन-ढांचे की ओर इशारा करता है। कानूनी स्तर पर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप कर चुका है लेकिन राहत की प्रकृति सीमित है। सुप्रीम कोर्ट ने SIR में नाम हटाए जाने और CEC द्वारा एकतरफा शक्ति प्रयोग के मुद्दे पर ECI और CEC को नोटिस जारी किया है और संबंधित याचिकाओं को विभिन्न SIR चुनौतियों के साथ मिलाकर सुनवाई के लिए स्वीकार किया है। एक PIL में मांग की गई है कि बहुमत वाले चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए निर्णयों को “शुरू से ही अमान्य” घोषित किया जाए और CEC के कामकाज के लिए जवाबदेही तय की जाए लेकिन यह स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। न्यायिक समीक्षा किसी विशेष प्रक्रियात्मक अवैधता को सुधार सकती है लेकिन व्यवस्थागत रूप से कमजोर हो चुके संस्थागत भरोसे को फिर से खड़ा करना उसके लिए मुश्किल है। अदालत कुछ मतदाताओं को बहाल करने,कुछ निर्णयों को अमान्य घोषित करने का आदेश दे सकती है लेकिन वह कार्यपालिका को नियुक्तियों में संयम बरतने का आदेश नहीं दे सकती और न ही भविष्य के CEC को सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया का स्वेच्छा से सम्मान करने का आदेश दे सकती है। समग्र मूल्यांकन के मद्देनजर नारिमन का यह कथन कि “वोट का अधिकार गंभीर खतरे में है”। एक मानदंडात्मक निर्णय है। केवल तथ्य-कथन नहीं अगर इसे “कोई एक चुनाव चुरा लिया गया है” के अर्थ में लिया जाए तो सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं और ECI का यह बचाव भी पूरी तरह आधारहीन नहीं है कि नाम हटाने से चुनाव परिणाम नहीं बदला लेकिन अगर इसे इस अर्थ में लिया जाए कि “वोट के अधिकार की रक्षा करने वाले संस्थागत उपकरण साथ-साथ कमजोर हो रहे हैं तो तथ्यों की यह श्रृंखला ठोस है। बड़े पैमाने पर नाम हटाना अपील में भारी बहुमत को बहाली,आंतरिक असहमति की अनदेखी, नियुक्ति की स्वतंत्रता में गिरावट,न्यायिक राहत केवल बाद में मरम्मत कर सकती है। यह किसी “एकल साजिश” का वर्णन नहीं बल्कि संस्थागत क्षय का वर्णन है। हर कड़ी को अलग-अलग देखने पर कोई तकनीकी व्याख्या मिल सकती है लेकिन सबको जोड़कर देखने पर चित्र एक ऐसी चुनाव-शासन संरचना का बनता है जो अपनी गलतियों को सुधारने में लगातार असमर्थ होती जा रही है। असली खतरा यह नहीं कि “कोई क्या करना चाहता है” बल्कि यह है कि जब कोई कुछ करना चाहे तो उसे रोकने वाली कोई प्रभावी संस्थागत शक्ति बची ही न हो।

*वीडियो देखने के लिए लिंक खोलें*

https://youtube.com/shorts/pfNj5l0w8WM?si=oQ3ammfg-U_Xgqrb
   
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