*SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला:राहुल गांधी समेत 13 विपक्षी नेताओं की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस,CJI ने 'कोर्ट को धमकाने' पर जताई नाराजगी*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

 *SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला:राहुल गांधी समेत 13 विपक्षी नेताओं की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस,CJI ने 'कोर्ट को धमकाने' पर जताई नाराजगी*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


          *Press wire| Congress| 16 Oct*





मुंबई | मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं और बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम काटे जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (15 अक्टूबर, 2026) को चुनाव आयोग और उसके शीर्ष अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह नोटिस लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और 'इंडिया' गठबंधन के 13 नेताओं की ओर से दायर याचिका पर दिया गया है। सुनवाई की मुख्य बातें जाने तो किसे नोटिस? सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI), मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किया है। बेंच देखें तो मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट का रुख के हिसाब से कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने का मतलब यह नहीं है कि वह किसी के आचरण को सही ठहरा रही है। CJI ने कहा कि कोई भी न्यायपालिका को दबाव में नहीं डाल सकता। हम हाथी दांत के टावर में नहीं बैठे हैं। हमें सब पता है। याचिकाकर्ता के आचरण पर सवाल उठाए । कोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई की तारीख पर याचिकाकर्ताओं में से एक से उसके आचरण के बारे में पूछा जाएगा हालांकि बेंच ने यह नहीं बताया कि किस याचिकाकर्ता की बात की जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह टिप्पणी 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक किए गए विपक्षी ''मार्च''के संदर्भ में है। याचिका में क्या मांगा गया?वह जाने तो राहुल गांधी,मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव,तेजस्वी यादव,सुप्रिया सुले,संजय राउत समेत 13 नेताओं की याचिका में मुख्य रूप से ये मांगें शामिल हैं। स्वतंत्र जांच के मद्देनजर एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति गठित कर SIR में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गई है। ECI के रिकॉर्ड के बारे में जाने तो चुनाव आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड (फाइलें,मिनट्स,नोटिंग्स) पेश करने का निर्देश देने की मांग की गई है। वोटर डिलीशन का ऑडिट का मामला देखें तो मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के फैसलों का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की गई है। सुरक्षा उपाय के मद्देनजर किसी भी असली वोटर का नाम बिना नोटिस और सुनवाई का मौका दिए हटाए जाने पर रोक लगाने की मांग की गई है। राजनीतिक पृष्ठभूमि के मद्देनजर यह याचिका ऐसे समय में दायर की गई है। जब SIR प्रक्रिया को लेकर देशभर में विपक्षी दलों का विरोध प्रदर्शन जारी है। आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद SIR को लेकर एकतरफा फैसले लिए हैं। विपक्षी नेताओं ने 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च कर यह याचिका दायर की थी। जिसके बाद कोर्ट ने यह सुनवाई की। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच इस पूरे विवाद की कुछ ऐसी परतें हैं जो अब तक सुर्खियों से बाहर रही हैं। इनमें नाम कटने के आंकड़ों का बारीक विश्लेषण, कानूनी पेचीदगियां, अंतरराष्ट्रीय संदर्भ और विपक्षी एकजुटता की सच्चाई शामिल है। नाम कटने के आंकड़े को लेकर सिर्फ ''मृत''और ''स्थानांतरित'' ही नहीं‌। कांग्रेस नेता जयराम रमेश के अनुसार पहले दो चरणों में हटाए गए कुल नामों में मृतकों (Dead) की हिस्सेदारी लगभग 20% और डुप्लीकेट (Duplicates) की 8% रही। इसका मतलब है कि लगभग 72% नाम ''अनुपस्थित''(Absent) और ''स्थानांतरित''(Shifted) श्रेणी में आते हैं यानि बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम कटे हैं‌। जो जीवित हैं और मताधिकार के पात्र हैं लेकिन गणना के दौरान नहीं मिले या अपनी जगह से विस्थापित हो गए। कुछ आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। वह जाने तो गुजरात में दादरा और नगर हवेली तथा दमन-दीव से यहां लगभग 30% मतदाताओं के नाम हटे। जो देश में सबसे अधिक है। इनमें से 22.5% नाम सिर्फ इसलिए कटे क्योंकि बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उन्हें ढूंढ नहीं पाए। महाराष्ट्र से 9.79 करोड़ मतदाताओं में से 1.2 करोड़ के डेटा में तार्किक विसंगतियां मिलीं और पुणे जैसे इलाकों में 40.6% मतदाता सूची से गायब पाए गए। भिवंडी पूर्व (महाराष्ट्र) से एक विधानसभा क्षेत्र में ही 49% मतदाताओं के नाम कट गए। 3.76 लाख में से 1.84 लाख। हरियाणा से ड्राफ्ट रोल में 16.4% मतदाता बाहर हो गए। कानूनी पेचीदगी के हिसाब से नोटिस और सुनवाई का अधिकार । याचिका में एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यह उठाया गया है कि चुनाव आयोग ने हटाए गए मतदाताओं को फिर से फॉर्म 6 भरने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह मांग धारा 28 (RP अधिनियम,1950) में निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन है और धारा 31 के तहत झूठी घोषणा पर एक साल तक की जेल हो सकती है यानि निर्दोष मतदाता को कानूनी जोखिम में डाला जा रहा है हालांकि मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR को बरकरार रखते हुए कहा था कि यह धारा 21(3) RP अधिनियम के तहत वैध है। जो "किसी भी समय,दर्ज किए जाने वाले कारणों के लिए"विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देती है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि निर्वाचक सूची में नाम होने से वैधता का अनुमान तो लगता है लेकिन यह"अपरिवर्तनीय नहीं"है। यही कानूनी आधार अब विवाद का केंद्र है । क्या यह अनुमान किसी भी हालत में मतदाता पर सबूत का बोझ डाल सकता है? विपक्ष की एकजुटता के मद्देनजर तस्वीर आधी-अधूरी दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट तक के मार्च और याचिका को विपक्षी एकजुटता का प्रतीक बताया गया लेकिन हकीकत इससे अलग है। पांच बड़ी विपक्षी पार्टियां इस मुहिम से दूर रहीं। DMK (तमिलनाडु) एम.के.स्टालिन की पार्टी ने अलग रास्ता अपनाया। TVK (तमिलनाडु) विजय की पार्टी भी INDIA गठबंधन के साथ नहीं दिखी। अन्य दलों में कुछ क्षेत्रीय दलों ने SIR पर असहमति जताते हुए भी राहुल गांधी के नेतृत्व वाले मार्च में शामिल होने से परहेज किया। तमिलनाडु में INDIA गठबंधन के घटकों ने अलग से चेन्नई में विरोध प्रदर्शन किया। इसका मतलब है कि SIR का मुद्दा विपक्ष को एकजुट करने के बजाय उसकी आंतरिक दरारों को भी उजागर कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ के मद्देनजर अमेरिका में''अपना SIR''है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के SIR मॉडल का सीधा जिक्र करते हुए अपने देश में मतदाता सूची की "सफाई"की वकालत की है। सितंबर 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को SAVE डेटाबेस के जरिए राज्यों को यह जांचने की अनुमति दी कि मतदाता नागरिक हैं या नहीं। ट्रंप ने सीईसी ज्ञानेश कुमार का नाम लेकर भारत की तारीफ की और कहा कि भारत और ब्राजील बायोमेट्रिक डेटाबेस से वोटर आईडी जोड़ते हैं। जबकि अमेरिका में सिर्फ स्व-घोषणा (Self-attestation) पर भरोसा किया जाता है हालांकि तथ्य यह है कि भारत में भी आधार को वोटर आईडी से जोड़ना स्वैच्छिक है। अनिवार्य नहीं और SIR में हटाए गए 13 करोड़ नामों में से कितने गैर-नागरिक पाए गए। इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा अब तक सामने नहीं आया है यानि जिस "नागरिकता जांच"के नाम पर SIR को सही ठहराया जा रहा है। उसका असल नतीजा अब तक अज्ञात है। चुनाव आयोग के भीतर क्या हुआ? वह जाने तो विपक्ष का आरोप है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद एकतरफा फैसले लिए। चुनाव आयोग के सूत्रों के मुताबिक SIR पर चर्चा के दौरान दोनों चुनाव आयुक्तों ने सवाल और टिप्पणियां जरूर कीं लेकिन किसी ने औपचारिक असहमति (Formal Dissent) दर्ज नहीं कराई। आयोग का कहना है कि सभी आदेशों पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं और तीन-सदस्यीय ढांचा मतभेद की स्थिति में बहुमत के सिद्धांत पर काम करता है। राहुल गांधी ने इस पर पलटवार करते हुए कहा है कि "वोट चोरी राजद्रोह है"यानि चुनाव आयोग की आंतरिक प्रक्रिया को लेकर भी दो पूरी तरह अलग-अलग नैरेटिव मौजूद हैं। SIR का मामला अब सिर्फ मतदाता सूची का मुद्दा नहीं रह गया है। यह कानूनी व्याख्या,संस्थागत प्रक्रिया,राजनीतिक एकजुटता और अंतरराष्ट्रीय उदाहरण चारों स्तरों पर एक साथ खड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई (26 अक्टूबर को महाराष्ट्र मामले पर) में यह देखना अहम होगा कि कोर्ट "तार्किक विसंगति" की परिभाषा स्पष्ट करता है या नहीं क्योंकि फिलहाल याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें खुद यह नहीं पता कि"तार्किक विसंगति"का मतलब क्या है।

~By √•Press Wire MCP• Digital World•


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